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Discrimination on the look and feel of women is a form of social injustice, know these issues related to respect and equality and also their rights. | महिलओं के रूप-रंग को लेकर किया गया भेदभाव भी सामाजिक अन्याय है, समानता से जुड़े इन्हीं मुद्दों को जानें और अधिकारों को भी

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स्नेहा निलय शाह3 घंटे पहले

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  • स्त्री के लिए दुनिया बदली तो है, लेकिन आज भी कुछ सामाजिक व्यवहार उसे बराबरी का दर्जा नहीं देते। कहने के लिए ये छोटी-छोटी बातें होती हैं, लेकिन वास्तव में ये भी सामाजिक अन्याय का ही रूप हैं।
  • 20 फरवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस के मौक़े पर जानिए कि यह न्याय एक आम स्त्री के लिए कितना ज़रूरी और महत्वपूर्ण है…

पढ़ाई, रोज़गार और इनसे जुड़े अधिकारों के लिए महिलाओं का संघर्ष बहुत पुराना है और अब भी जारी है। कुछ अन्याय हम सामान्य तौर पर अपने आस-पास घटित होते हुए देखते हैं, लेकिन नज़रअंदाज़ कर देते हैं। जब महिलाओं-बालिकाओं के रूप या कमियों को लेकर असामान्य व्यवहार किया जाता है या मज़ाक़ उड़ाया जाता है, तो वो अंदर ही अंदर टूट जाती हैं। ये केवल एक उदाहरण है, स्त्रियां इस तरह की कई बातों से रोज़ाना जूझती हैं। विश्व सामाजिक न्याय दिवस पर हम महिलाओं के सम्मान और समानता से जुड़े इन्हीं मुद्दों पर बात कर रहे हैं।

इनकी जानकारी ज़रूरी

इन सामाजिक मुद्दों को दो भागों में समझिए। पहला जिनके लिए क़ानून हैं और दूसरा जिनके लिए क़ानून बने ही नहीं हैं, लेकिन उनके खिलाफ़ अमूमन आवाज़ भी नहीं उठाई जाती। महिलाओं को अक्सर रंग, रूप, आकार और क़द से आंका जाता है। कुछ मामलों में इन बातों को लेकर दफ़्तरों में भी भेदभाव होते हैं। इसके अलावा एकल मां को बच्चों की परवरिश को लेकर ताने दिए जाते हैं। इनके विरुद्ध क़ानून हैं लेकिन उनकी जानकारी कम है। वहीं दूसरी तरफ़ घर और दफ़्तर में महिला को सम्मान न देना, सुविधाओं से वंचित रखना भी असमानता का बड़ा मुद्दा है। हालांकि इनकी परिभाषाओं को लेकर स्पष्टता नहीं है। इन दोनों स्थिति में ख़ुद को क्या करना चाहिए और दूसरों की मदद कैसे की जा सकती है, आइए, समझते हैं।

उपनाम बदलने का दबाव

शादी के बाद महिला अपना सरनेम (उपनाम) बदलना चाहती है या नहीं, ये उसकी ख़ुद की मर्ज़ी है। कई महिलाएं अपना सरनेम नहीं बदलना चाहतीं, इसके बावजूद उन पर सरनेम बदलने का दबाव डाला जाता है। भारतीय क़ानून के तहत शादी के बाद भी अगर महिला अपना पुराना नाम या सरनेम बदलना नहीं चाहती तो कोई भी व्यक्ति उसे यह करने पर मजबूर नहीं कर सकता। इसके अलावा, तलाक़शुदा महिला अपना पुराना सरनेम वापस लगाना चाहे तो लगा सकती है।

भुगतान में भेदभाव

कई जगहों पर महिलाओं का वेतन/पारिश्रमिक पुरुषों के मुक़ाबले कम होता है। अगर वे समान पद पर हैं और बराबर की ज़िम्मेदारी/कार्य संभालती हैं, इसके बावजूद वेतन कम है, तो महिलाएं अपने अधिकार के लिए खड़ी हो सकती हैं। समान पारिश्रमिक अधिनियम (1976) कहता है कि किसी समान कार्य या समान प्रकृति के काम के लिए पुरुषों व महिलाओं दोनों श्रमिकों को समान पारिश्रमिक का भुगतान प्रदान किया जाएगा। यह अधिनियम भर्ती प्रक्रिया में महिलाओं के साथ लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकता है। इसके लिए नियोक्ता व कंपनी के विरुद्ध कार्रवाई का प्रावधान है। ऐसा होने पर कंपनी के संगठन में शिकायत दर्ज करा सकती है और आगे पुलिस के पास भी जा सकती है।

रंग-रूप पर टिप्पणी

बॉडी शेमिंग को लेकर भारत में सीधे तरीक़े से कोई क़ानून नहीं है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय क़ानून इसके विरुद्ध हैं। इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट 1882 के तहत किसी को भी उसके ज़्यादा मोटे या पतले होने की वजह से नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार के तहत किसी भी व्यक्ति को उसके शारीरिक रूप के आधार पर या उसके लिंग के आधार पर जांचा, परखा या बर्ताव नहीं किया जा सकता। कार्यस्थल पर महिला का शारीरिक शोषण अधिनियम 2013 भी महिलाओं को कार्यस्थल पर बॉडी शेमिंग के ख़िलाफ़ लड़ने में मदद करता है। कार्यस्थल पर कई महिलाएं अपमानजनक टिप्पणियों और व्यवहार का सामना करती हैं। ऐसे में वह पुलिस में शिकायत दर्ज करवा सकती है। वह जहां कार्यरत है उसके संगठन में भी लिखित रूप से शिकायत दर्ज करवा सकती है।

एकल मां को ताने

भारतीय समाज मे अकेली मां होना अपने आप में बहुत बड़ा गुनाह माना जाता है। अकेली मां बच्चों की परवरिश करती है तो उस पर कई उंगलियां उठाई जाती हैं। उसे रोज़ कई सवालों के जवाब देने पड़ते हैं। नए क़ानून के तहत एकल माता चाहे विवाहित हो या अविवाहित, अपने बच्चे के जन्म के समय उसे बच्चे के पिता का नाम बताना या लिखना अनिवार्य नहीं है। इसके अलावा अविवाहित एकल मां को तब तक उसके बच्चे की कस्टडी मिली रहती है जब तक उसके ख़िलाफ़ कोई कोर्ट में नहीं जाता।

ज़बरदस्ती शादी कराना

कई बार युवती की मर्ज़ी की परवाह किए बग़ैर उस पर शादी के लिए दबाव बनाया जाता है। क़ानून हर महिला को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है। कोई भी समाज या व्यक्ति उससे उसका यह अधिकार नहीं छीन सकता और न ही 18 साल की उम्र से पहले शादी करने के लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती की जा सकती है। ऐसा करने पर लड़की पुलिस में शिकायत दर्ज करवा सकती है या जिला पंचायत में भी शिकायत दर्ज करा सकती है।

इन मुद्दों पर पहल ज़रूरी

कई बार आस-पड़ोस में लड़कियों या महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव हम अक्सर देखते हैं, लेकिन उन पर ध्यान नहीं देते। भले इन मुद्दों के लिए कोई क़ानून नहीं बनाए गए हैं, लेकिन इनके ख़िलाफ़ पहल कर सकते हैं। जब इन मुद्दों के विरुद्ध क़दम बढ़ाएंगे, तो यह न्याय का पहला क़दम होगा और अधिकार पाने का भी।

समान सुविधा का अधिकार

आर्थिक स्थिति अच्छी होने के बावजूद अगर पत्नी और बेटी को अच्छे कपड़े पहनने के लिए न दिए जाएं, लेकिन पति और बेटे के कपड़े अक्सर बढ़िया होते हों, तो ये असमानता है। अगर आस-पड़ोस में ऐसी असमानता नज़र आए, तो महिला से बात करें। अगर वो आपसे बात नहीं करना चाहती, तो उसे काउंसलर से बात करने के लिए प्रोत्साहित करें।

परिवार से दूर करना

कई मामलों में विवाहित महिला को उसके माता-पिता या परिवार से मिलने तक नहीं दिया जाता। इस स्थिति में आप महिला से बात कर सकती हैं। यदि वह अपनी आज़ादी और अधिकार के लिए लड़ना चाहती है, तो आगे बढ़कर उसकी मदद करें। इसके लिए महिला संगठनों या पुलिस की मदद ली जा सकती है।

कार्यस्थल पर व्यवहार

दफ़्तर में महिलाओं के काम की तुलना पुरुषों से की जाती है। उनके काम को लेकर ताने दिए जाते हैंै। बिना वाजिब वजह के तय समय से अधिक समय तक रोककर रखना भी दुर्व्यवहार और असमानता के अंतर्गत आता है। भेदभाव के चलते महिलाओं की तरक़्क़ी पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है और मानसिक तनाव बढ़ता है। इसके खिलाफ़ महिला आवाज़ उठा सकती है।

सम्मान की लड़ाई

सम्मान भी महिला का अधिकार है। अगर ये अधिकार उसे नहीं मिल रहा है, तो उसके लिए लड़ना भी ज़रूरी है। यदि कोई महिला शादी में ख़ुश नहीं है, तो उसे पति से बात करनी चाहिए। दोनों को पारिवारिक काउंसलर से सलाह लेनी चाहिए। इसके बावजूद बात नहीं बनती है, तो शादी से हटना भी एक उपयुक्त विकल्प होगा।

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